Friday, December 23, 2011

कसम ही कुछ ऐसी दे डाली थी....

जो दूर रूठा चाँद है मुझसे...उस चाँद से यह कहते है
इए चाँद तेरी चान्दिनी बिन गुमनाम से से हम कुछ रहते है.
यह बदकिस्मती है इश्क कि जो नाम मेहँदी   पे किसी और का है तेरी..
पर नाम उस से कैसे मिटाओगे मेरा,जिनकी सांसो में हम ही रहते है ...


अदा हो जाती हर दुआ जो तुम लौट आते..
कि मंदिरों कि दीवारे भी मुझे अब आशिक है पुकारती ...


वोह पल बिता हुआ भी ,अनजान सा सवाल एक  है पूछता मुझसे ..
कि जब वो खुद ही  कल बन चुकी है..तो क्यूँ मुझमे वो तश्वीर खोजा करते हो..


यह हंसी मेरे चेहरे की कुछ और नहीं बस एक एक धोखा है..
क्या करूँ  , जुदाई के दिन उसने कसम ही कुछ ऐसी दे डाली थी....



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