
मैं इश्क में तेरे कुछ इस कदर खो बैठा ...
कि सुबह शाम को एक नाम दे बैठा ...
नज़र तेरी मेरे खोखले मन में यूँ बैठी ...
सवालो के अश्क़ से जैसे एक ज़ाम दे बैठा...
कभी करीब आती थी तो कभी दूर जाती थी...
तेरी आवाज़ थी या कोई रेशमी अंगडाई थी...
मैं ख्यालो में उलझ सुबह को मेरी एक शाम दे बैठा..
एक नाम दे बैठा ...
अब आ गयी अंत की बेला तो है ये लग रहा ...
कि मिलम तेरा ना हो तो बस दीदार ही हो जाये..
तड़पती साँसों को दर्द भरा एक पैग़ाम दे बैठा ॥
एक नाम दे बैठा ...
//नज़र तेरी मेरे खोखले मन में यूँ बैठी ...
ReplyDeleteसवालो के अश्क़ से जैसे एक ज़ाम दे बैठा...//
Gazab sirji.. kya khoob likha hai .. :)
thanx adi...
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