Wednesday, February 9, 2011

गुंजन


रात काफी हो गयी थी ...कलम भी पता नहीं कौन सी दुश्मनी निकालने पे सवार है,बस कुछ पुराने नग्मे जुड जुड के कुछ कह जा रहे मेरी गुंजन से.........








कभी आती थी शाम आईने में तेरी झलक लेके ...
तेरी बिंदिया का वो लाल रंग ...तेरी आँखों का वो काजल ...
तेरे केशु की वो महक ...तेरे दामन जैसे कोई बादल...
कभी आती थी शाम आईने में तेरी झलक लेके ..

अभी कुछ दिनों पहले की बात तो लगती है ..
जब तू बैठ संग में ...चूड़ी के राग थी छेड़ती ...
कभी कुर्ते पे मेरे रंग डालती ..तो होंठो से मेरे खेलती ...
अभी कुछ दिनों पहले की बात तो लगती है ...

आ जा रहा हो जैसे पल मेरी खुशियों का मुझसे रूठ के ...

तेरी कुछ निशानी मेरे पास संभाल के रखी है ...
वो चाँद में साथ देखा एक सपना ...
एक रात ,एक दिन ,और कुछ पल का संग अपना ..
एक सिंदूर की डिबिया ,और एक काले रंग का धागा ,
एक जोड़ा लहंगा नीले रंग का ..माँ से था जो तुमने माँगा ..
एक किताब ,एक कहानी ,जो पढ़ती रात में साथ में ...
एक अंगूठी और सुनहरा कंगन रहता था जो दाहिने हाथ में ...
दो पल भी रखा है जो किनारे नदी बिताये थे ...
वो साज़ सारे रखे है जो आवाज़ में तेरी पाए थे ...
वो मुश्कुराहते भी है..कुछ अश्क़ मैंने रखे है ...
वो वक़्त गुज़रा रखा है ..वो नश्क मैंने रखे है ..
वो शाम पुरानी मेरे पास संभाल के रखी है ..
तेरी कुछ निशानी मेरे पास संभाल के रखी है ...

वो कल जो मेरा गा रहा गीत मुझसे रूठ के ..
आ जा रहा हो जैसे पल मेरी खुशियों का मुझसे रूठ के ...
बस अब दुआ ही कर सकता हूँ ...तेरी बेवफाई को भी मंजिल मिले ...
तू हँसे हर पल ,नज़र तेरी खुशियाँ पाए ,दिल मिले और दिल मिले ..
ख़ुशी मैं तलाश लूँगा ..लम्हे हो सच के या झूठ के ...
आ जा रहा हो जैसे पल मेरी खुशियों का मुझसे रूठ के ...
अब यही कहानी है जो मेरे साथ संभाल के रखी है ..
तेरी कुछ निशानी मेरे पास संभाल के रखी है ...

जैसे मेरे ख्वाबो को तेरी आई हो पलक लेके ..
कभी आती थी शाम आईने में तेरी झलक लेके ...
तेरी बिंदिया का वो लाल रंग ...तेरी आँखों का वो काजल ...

ये रात मेरे आँखों में दुल्हन के जैसे सजती है ...
अभी कुछ दिनों पहले की बात तो लगती है ..
जब तू बैठ संग में ...चूड़ी के राग थी छेड़ती ...

बात वो पुरानी है जो साथ संभाल के रखी है ..
तेरी कुछ निशानी मेरे पास संभाल के रखी है ...

शशि ' दिल से

3 comments:

  1. बस अब दुआ ही कर सकता हूँ ...तेरी बेवफाई को भी मंजिल मिले ...
    तू हँसे हर पल ,नज़र तेरी खुशियाँ पाए ,दिल मिले और दिल मिले ..

    Waah sirji waah.. bas aur kuch kehne layak nahi chhoda.. :)

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  2. बहुत बहुत अच्छी रचना..काफी दिनों बाद कुछ दिल से निकला पढ़ा


    एक पंक्ति में मेरा विरोधाभास है..

    बस अब दुआ ही कर सकता हूँ ...तेरी बेवफाई को भी मंजिल मिले ...

    आप प्यार को सार्वजानिक रूप से आरोपित कर रहें है.
    अगर मैं गलत हूँ तो माफ़ी चाहूँगा
    यदि आप का आरोप सत्य है भी तो बेवफाई शब्द का चयन ठीक नहीं लगा..



    बधाइयाँ..

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